Saturday, November 21, 2009

जीत

उस मंजर को सोचकर आज भी सहम जाता हूँ,|
आँखों के सामने अंधेरा छाया हुआ था,
आँखे खुली तो,
लाल रंग से ,मेरे माथे पर तिलक लगाकर चला गया था,
एक चुटकी तिलक से,
पूरा शरीर रंग चूका था,|
शायद मैं अब जीत चूका था,|........
सुना था मौत से डरने वाले को 'कायर' कहते है,|
जो मौत को हरा दे उसे क्या कहते होंगे?????.........
एक नहीं दो मर्तबा...............!!!!!!

नीरज कुमार गुप्ता
२१-११-२००९

No comments:

परछाई

------------------------------------------------------- ------------------------------------------------------- ढलती शाम में, आज बिजली ...