Tuesday, November 10, 2015

दादी


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छोटा था,याद नहीं है,

कब पापा के 'माई' को,
अपने दादी को गांव छोड़ कर आया था !

इतना याद है,हर छठ पूजा में,
दादी साथ होती !

जब साथ बैठती,
मेरे बचपन की बात बताती,
कैसे मिसा,मला था मैंने तुमको,
गोद में लिए गॉव घुमाया करती थी मैं,
शुबह गंगा नहाने निकली तो,
तू भोर में जागकर,
साथ जाने की जिद्द करता !

वो आँचल के पलु,
के गाँठ याद है मुझे,
जिसमे कुछ सिक्के खनकते थे,
जिसे मैं चुरा लिया करता था !

बहुत दिनों बाद,
कुछ दिन साथ बिताया था मैंने,
मेरे कही जाने से,
तुम चिंतित हो जाती,
सबसे पूछा करती,
'बबुआ ' कब आएगा !

जब तुम बीमार थी,
मिलने गया था मैं !
कपकपाते हांथो से मेरा हाँथ पकड़कर,
लड़खड़ाते शब्दों से सबका हाल जाना था,
आँखे भर आई थी,
तेरे लडखडाते शब्दों को सुनकर !

अनजान था मैं,
ये लड़खड़ाते शब्द युही रुक जायेगा !

पापा की 'माई'
मेरी दादी हमेशा याद आएगी  !!

                               
                           नीरज कुमार गुप्ता
                            02-11-2015
                             ( बलिया से )  

Thursday, July 2, 2015

अन्जान रिश्ते
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कुछ अन्जान रिश्ते बिखरे थे,
कोशिश की थी समेटने  की.
कुछ बिखरते गए,
कुछ और अन्जान होते गए !
कुछ रिश्ते पराये होते गए,
तो कुछ पराये अपने होते गए !

कुछ अन्जान रिश्ते बिखरे थे,
कोशिश की थी समेटने  की !

                                           नीरज कुमार गुप्ता
                                                 १-०७-१५ 

Thursday, June 18, 2015

              *  मुश्किलें  *

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जब छोटा था,मुश्किलें भी बहुत थी
बस अर्थ न मालूम थे,मुश्किलें के !

उम्र के साथ मुश्किलें भी बढ़ती गयी,
कुछ साथ आती गयी,कुछ साथ छोड़ती गयी !

था जवानी का दौर,जकड़ा था मुश्किलो का दौर !
निपट लिया था,मैंने मुश्किलो को आसानी से,
बस निकल गया था ये दौर !

कुछ ने पाठ पढ़ाया,कुछ ने जीवन का दर्शन कराया !
साथ मेरा मुश्किलो का,
ठहर जाये तो अच्छा,न ठहरे तो और अच्छा !

मुसकुरा दिया मैंने,
मुश्किलो को देखकर,आधे लौट गए
कुछ बौनों की तरह !!

बस आदत सी हो गयी है,
तुझे देखकर मुस्कराने की !!

                                          नीरज कुमार गुप्ता
                                             १८-०६-२०१५ 

Sunday, June 14, 2015

भुलक्कड़
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जिंदगी के आपा धापी में.
कुछ भुलक्कड़ सा हो गया हुँ !

हाँथ में चाभी लिए चाभी ढूंढता हुँ !
वॉलेट को बैग में रख कर ,
पेन को पॉकेट में रख कर,
न जाने क्या क्या ,कहा कहा
ढूंढता हुँ !

कुछ भुलक्कड़ सा हो गया हुँ !

न जाने ये कैसी भुलक्कड़ सी,
जिंदगी हो गयी है !

जो किताब में मन और,
मन में किताब रख कर
सोना भूल जाता हुँ  !

 कुछ भुलक्कड़ सा हो गया हुँ !

                                            नीरज कुमार गुप्ता
                                                १४-०६-२०१४ 

पहचान

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दस बाई दस का कमरा ,
धुलो से भरा,जालो से पटा !

कोने में पड़ी मेज ,साथ में रखी चेयर ,
आलमारी पर रखे बुक्स,
धूल के फांक खा रहे होंगे।

कही चाय के प्याले लुढ़के होंगे।
नंगी खिड़की से आती रोशनी,
धूल के कणों पर चमकते होंगे !

दीवारो पे कुरेदे,कुछ फॉर्मूले,
धूल के कणो में से झांकते होंगे !
कही किसी जगह अपना,
पहचान छोड़ आया हुँ !

पहचान लेंगे वो,
जिसका नया ठिकना होगा !

 किसी कोने में अपना,
नाम लिख छोड़ आया हुँ !


                             नीरज कुमार गुप्ता
                                  ११-०६-२०१५ 

Thursday, January 29, 2015

नोटबुक

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मेरे नोटबुक के पन्ने कुछ दोस्तों
की तरह थे !
जिस पे नाम लिखा था,
कुछ पे अपना राज़ लिखा था !

'वो' बच गए !

बाकी समय के साथ कुछ
मुड़ गए,कुछ पलट गए,
कुछ में सिलवटे पड़ गए,
कुछ गायब हो गए  !!

                        नीरज कुमार गुप्ता
                            २६-०१-१५ 

परछाई

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