Wednesday, November 10, 2010

चाँद

कभी चाँद से तुलना किया,कभी चांदनी रात से...कभी निशा से तो कभी अम्बर से,|
होगा सामना जब चाँद से, पूछ लेना उसके सूरत को....!!!
जब चाँद न बताये उस सूरत को....देख लेना चालन उठाकर उस चाँद को...!!!
शायद मै खड़ा हुगा..चांदनी रात लेकर....!!!
नीरज कुमार गुप्ता
२५-१०-१०

Tuesday, September 14, 2010

जब मै छोटा था

जब मै छोटा था, तो ये दुनिया बहुत अजीब सी लगती थी....
आज भी याद है, मेरे घर से वो स्कूल का रास्ता....
रास्ते में चाट का ठेला,दाने वाले भैया की दुकान,स्कूल के गेट के बहार चूरन वाले की दुकान, बर्फ के गोले,
एक गरीब बूढी दादी जो अमरूद बेचा करती थी,जिसे अक्सर अपना टिफिन दे दिया करता था,
सब कुछ था वहा,
पर आज सब बदला-बदला सा है,'मोबाइल शॉप','काफी शॉप','मोडर्न रेस्तरा' सबने उनका जगह ले लिया है.
फिर सब सुना है.........
सायद ये दुनिया सिमट रही है....



आज भी याद है,पतंग के डोर के साथ देर तक उलझे रहना,
तब शायद शाम लम्बी हुआ करती थी....
दोस्तों के झुण्ड के साथ देर शाम तक खेलना...
गपे मारना...बहुत कुछ,
वो हर शाम थक के चूर हो जाना.....
बस आज फर्क इतना है की,अब शाम नहीं होती,दिन ढलता है और सीधे रात हो जाती है|
शायद दुनिया सिमट रही है|


आज भी याद है,दोस्तों के घर खाना खाना, एक दूसरे की खिचाई करना,
एक्साम टाइम में पूरी रात जागना,किसी त्योहार पर साथ-साथ घूमना,
आज भी याद है......
शायद दोस्ती बहुत गहरी हुआ करती थी,,,,,,,
पर दोस्ती जाने कहा है,वो पास होते हुए भी दूर है.......
अब तो 'होली','दिवाली''ईद' और नए साल पर बस मोबाइल से सन्देश आ जाते है|
शायद अब नाजुक रिश्ते बदल रहे है.............

नीरज कुमार गुप्ता
०२\०९\१०

Wednesday, August 18, 2010

सावन

आग बरसे,
सब पानी के तरसे,
खेत-खलिहान,बाग़ बगीचे,
पानी को तरसे,
बदल से पूछत,पानी कब बरसे,
बदल कहत,"गौरया" नहाये,
तब झूम-झूम कर बरसे,

जब आग बरसे, शरीर से पानी टपके,
अब तो सावन भी पानी को तरसे |

किसानो की आँखे जम,सांसे थम गयी,
मेघ कब गरजे,
गरजे तो बरसे कब?....

अब तो सावन भी मोडर्न हो चला,
मायका छोड़,ससुराल भिगो रहा....|

आसाढ़ जात,सावन आयो,
कही सुखा तो कही बाढ़ लायो,|

नीरज कुमार गुप्ता
१५-०८-१०

Friday, April 9, 2010

गम

बिछड़े हुये यादो को संजोये रखना,
गम को भुलाकर,
खुशी से जीने की चाह रखना|
हो सके मै,
आज नहीं तो कल,
तुम्हरे आशु पोछने आऊंगा|
बस तुम खुशी से,
जीने की चाह रखना|

नीरज कुमार गुप्ता
१०/०४/१०

Tuesday, March 30, 2010

'तुम्ही'

जब फागुन आया तो,फूलो ने साथ छोड़ा|
जब चैत आया तो,पतों ने पेड़ो का साथ छोड़ा|
सावन आया तो ,घटाओ ने साथ छोड़ा |
जब ज्वार आया तो,लहरों ने सागर का साथ छोड़ा |
जब कोहरा हुआ तो, पवन ने साथ छोड़ा |
जब दुःख आया तो, आशुओ ने आँखों का साथ छोड़ा |
जब गरीबी आई तो,पैसो ने साथ छोड़ा|
जब तूफान आया तो, कसती ने किनारा छोड़ा|
जब मेरे ऊपर दुखों का पहाड़ आया तो ,अपनों ने साथ छोड़ा|
बस 'तुम्ही' हो जिसने मेरा कभी न साथ छोड़ा|
नीरज कुमार गुप्ता
३०/०३/१०

पतझड़

पतझड़ के पत्तो पर
अपना नाम लिख आया हू|
चैत के मौसम में,
पछुओ हवा के झोको से ये,
कभी ना कभी तेरे आँगन में गिरेंगे |
जब तू आँगन में निकलोगी,
ये तेरे बालो और पैरो से लिपट जाएंगे |
जब-जब तुझसे पत्ते,
स्पर्श किया करेंगे |
मै अपने आप को तुम से लिपटा पाऊंगा |
मेरे उस स्नेह पत्ते को ,
अपने गले से लगाकर रखना|
उसे कही अपने किताबो के अन्दर,
पन्नो में दबाकर रखना|
जब मेरी याद आये,
उसे गले से लगा लेना.........!!
बस एक बार याद कर लेना............!!!

नीरज कुमार गुप्ता
३०/०३/१०

परछाई

------------------------------------------------------- ------------------------------------------------------- ढलती शाम में, आज बिजली ...