जब मै छोटा था, तो ये दुनिया बहुत अजीब सी लगती थी....
आज भी याद है, मेरे घर से वो स्कूल का रास्ता....
रास्ते में चाट का ठेला,दाने वाले भैया की दुकान,स्कूल के गेट के बहार चूरन वाले की दुकान, बर्फ के गोले,
एक गरीब बूढी दादी जो अमरूद बेचा करती थी,जिसे अक्सर अपना टिफिन दे दिया करता था,
सब कुछ था वहा,
पर आज सब बदला-बदला सा है,'मोबाइल शॉप','काफी शॉप','मोडर्न रेस्तरा' सबने उनका जगह ले लिया है.
फिर सब सुना है.........
सायद ये दुनिया सिमट रही है....
आज भी याद है,पतंग के डोर के साथ देर तक उलझे रहना,
तब शायद शाम लम्बी हुआ करती थी....
दोस्तों के झुण्ड के साथ देर शाम तक खेलना...
गपे मारना...बहुत कुछ,
वो हर शाम थक के चूर हो जाना.....
बस आज फर्क इतना है की,अब शाम नहीं होती,दिन ढलता है और सीधे रात हो जाती है|
शायद दुनिया सिमट रही है|
आज भी याद है,दोस्तों के घर खाना खाना, एक दूसरे की खिचाई करना,
एक्साम टाइम में पूरी रात जागना,किसी त्योहार पर साथ-साथ घूमना,
आज भी याद है......
शायद दोस्ती बहुत गहरी हुआ करती थी,,,,,,,
पर दोस्ती जाने कहा है,वो पास होते हुए भी दूर है.......
अब तो 'होली','दिवाली''ईद' और नए साल पर बस मोबाइल से सन्देश आ जाते है|
शायद अब नाजुक रिश्ते बदल रहे है.............
नीरज कुमार गुप्ता
०२\०९\१०
आज भी याद है, मेरे घर से वो स्कूल का रास्ता....
रास्ते में चाट का ठेला,दाने वाले भैया की दुकान,स्कूल के गेट के बहार चूरन वाले की दुकान, बर्फ के गोले,
एक गरीब बूढी दादी जो अमरूद बेचा करती थी,जिसे अक्सर अपना टिफिन दे दिया करता था,
सब कुछ था वहा,
पर आज सब बदला-बदला सा है,'मोबाइल शॉप','काफी शॉप','मोडर्न रेस्तरा' सबने उनका जगह ले लिया है.
फिर सब सुना है.........
सायद ये दुनिया सिमट रही है....
आज भी याद है,पतंग के डोर के साथ देर तक उलझे रहना,
तब शायद शाम लम्बी हुआ करती थी....
दोस्तों के झुण्ड के साथ देर शाम तक खेलना...
गपे मारना...बहुत कुछ,
वो हर शाम थक के चूर हो जाना.....
बस आज फर्क इतना है की,अब शाम नहीं होती,दिन ढलता है और सीधे रात हो जाती है|
शायद दुनिया सिमट रही है|
आज भी याद है,दोस्तों के घर खाना खाना, एक दूसरे की खिचाई करना,
एक्साम टाइम में पूरी रात जागना,किसी त्योहार पर साथ-साथ घूमना,
आज भी याद है......
शायद दोस्ती बहुत गहरी हुआ करती थी,,,,,,,
पर दोस्ती जाने कहा है,वो पास होते हुए भी दूर है.......
अब तो 'होली','दिवाली''ईद' और नए साल पर बस मोबाइल से सन्देश आ जाते है|
शायद अब नाजुक रिश्ते बदल रहे है.............
नीरज कुमार गुप्ता
०२\०९\१०
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