Wednesday, August 18, 2010

सावन

आग बरसे,
सब पानी के तरसे,
खेत-खलिहान,बाग़ बगीचे,
पानी को तरसे,
बदल से पूछत,पानी कब बरसे,
बदल कहत,"गौरया" नहाये,
तब झूम-झूम कर बरसे,

जब आग बरसे, शरीर से पानी टपके,
अब तो सावन भी पानी को तरसे |

किसानो की आँखे जम,सांसे थम गयी,
मेघ कब गरजे,
गरजे तो बरसे कब?....

अब तो सावन भी मोडर्न हो चला,
मायका छोड़,ससुराल भिगो रहा....|

आसाढ़ जात,सावन आयो,
कही सुखा तो कही बाढ़ लायो,|

नीरज कुमार गुप्ता
१५-०८-१०

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