Thursday, June 18, 2015

              *  मुश्किलें  *

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जब छोटा था,मुश्किलें भी बहुत थी
बस अर्थ न मालूम थे,मुश्किलें के !

उम्र के साथ मुश्किलें भी बढ़ती गयी,
कुछ साथ आती गयी,कुछ साथ छोड़ती गयी !

था जवानी का दौर,जकड़ा था मुश्किलो का दौर !
निपट लिया था,मैंने मुश्किलो को आसानी से,
बस निकल गया था ये दौर !

कुछ ने पाठ पढ़ाया,कुछ ने जीवन का दर्शन कराया !
साथ मेरा मुश्किलो का,
ठहर जाये तो अच्छा,न ठहरे तो और अच्छा !

मुसकुरा दिया मैंने,
मुश्किलो को देखकर,आधे लौट गए
कुछ बौनों की तरह !!

बस आदत सी हो गयी है,
तुझे देखकर मुस्कराने की !!

                                          नीरज कुमार गुप्ता
                                             १८-०६-२०१५ 

Sunday, June 14, 2015

भुलक्कड़
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जिंदगी के आपा धापी में.
कुछ भुलक्कड़ सा हो गया हुँ !

हाँथ में चाभी लिए चाभी ढूंढता हुँ !
वॉलेट को बैग में रख कर ,
पेन को पॉकेट में रख कर,
न जाने क्या क्या ,कहा कहा
ढूंढता हुँ !

कुछ भुलक्कड़ सा हो गया हुँ !

न जाने ये कैसी भुलक्कड़ सी,
जिंदगी हो गयी है !

जो किताब में मन और,
मन में किताब रख कर
सोना भूल जाता हुँ  !

 कुछ भुलक्कड़ सा हो गया हुँ !

                                            नीरज कुमार गुप्ता
                                                १४-०६-२०१४ 

पहचान

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दस बाई दस का कमरा ,
धुलो से भरा,जालो से पटा !

कोने में पड़ी मेज ,साथ में रखी चेयर ,
आलमारी पर रखे बुक्स,
धूल के फांक खा रहे होंगे।

कही चाय के प्याले लुढ़के होंगे।
नंगी खिड़की से आती रोशनी,
धूल के कणों पर चमकते होंगे !

दीवारो पे कुरेदे,कुछ फॉर्मूले,
धूल के कणो में से झांकते होंगे !
कही किसी जगह अपना,
पहचान छोड़ आया हुँ !

पहचान लेंगे वो,
जिसका नया ठिकना होगा !

 किसी कोने में अपना,
नाम लिख छोड़ आया हुँ !


                             नीरज कुमार गुप्ता
                                  ११-०६-२०१५ 

परछाई

------------------------------------------------------- ------------------------------------------------------- ढलती शाम में, आज बिजली ...