Monday, November 30, 2009

माँ

माँ तू बहुत याद आती .....

जब होश सम्भाला,तेरा पलू पकड़कर चलते पाया |
तू जहा जाती, तेरा पलू पकड़कर वहा चला आता |

रात को रोता ,तू लोरी सुना सुला देती
मिट्टी खाता,तो तू मुझे नहला देती |

शरारत इतना करता,फिर भी तू नहीं झुंझलाती,
थोडा बड़ा हुआ,स्कूल जाने को,
तेरे माथे पर चिंता की लकीरे पड़ने लगी|

मेरे स्कूल जाने पर,
खिड़की पर बैठे ,आने का इंतजार करती तू|

बहुत याद तू आती है माँ........

कभी गिरता तो,तेरे मुख से आह निकलती,
खरोच आने पर, तेरे जिस्म से खून निकलता |

मेरे जिद्ध के आगे,तुझे झुकना पड़ा |
परेशान कितना किया है न माँ,

जब बीमार होता,तू बैठ सारी रात बिता देती|
जब मैं कही जाता, आँखों से काजल उतार मेरे माथे पर लगा देती|

तू बहुत याद आती है माँ...........!!!!

नीरज कुमार गुप्ता
३०-११-०९

Wednesday, November 25, 2009

डर

शायद अभी भी डरता है वोह मुझसे........
कभी देखा नहीं, परखा, सोचा, और समझा भी नही...
याद है, मुझे एक बार
नाम पुछा था मैंने उसका

फिर भी जाने क्यूँ
डरता है वोह मुझसे

शायद कभी..किसी मोड़ पर मुलाक़ात हो,
आँखें भी चार हो
सोचता रहता हूँ ..क्या करेगा वोह

डरना भी प्यार का हिस्सा तो नहीं
शायद इसीलिए..डरता हो वोह मुझसे...

नीरज कुमार गुप्ता
२५-११-०९

Saturday, November 21, 2009

जीवन

तेरे आँखों में अपना नशा खोजता हू,
तेरे बालों के छाये में अपना परछाई खोजता हू,
तेरे होठो पर अपने जज्बात खोजता हू,
तेरे सासों में अपना जीवन खोजता हू,.........
शायद एक दिन मेरी मंजिल मिल जाये|
नीरज कुमार गुप्ता
१७-११-०९

ख्वाब

पता नहीं आज कल तेरे ख्वाब बहुत आते है,|
तुमने मेरे दिलो दिमाग में जगह बना ली है,|
अपने हर मोबाइल के घंटी में तुझे खोजता हु,|
जब कंप्यूटर ऑन करता हु तो डेस्कटॉप पर तुझे खोजता हु,|
पता नहीं क्यों अपने साइन की जगह तेरा नाम लिख देता हु, |
पता नहीं आज कल तेरे ख्वाब बहुत आते है,.......
हर नए काम के पहले तेरा नाम लेता हु, |
हर मेसेज में तुझे खोजता हु, चाहे वह कंपनी के ही क्यों न हो,|
एक्साम में अपने नाम की जगह तेरा नाम लिख कर चला आता हु,|
पता नहीं आज कल तेरे ख्वाब बहुत आते है,.........
नीरज कुमार गुप्ता
१७-११-०९

जीत

उस मंजर को सोचकर आज भी सहम जाता हूँ,|
आँखों के सामने अंधेरा छाया हुआ था,
आँखे खुली तो,
लाल रंग से ,मेरे माथे पर तिलक लगाकर चला गया था,
एक चुटकी तिलक से,
पूरा शरीर रंग चूका था,|
शायद मैं अब जीत चूका था,|........
सुना था मौत से डरने वाले को 'कायर' कहते है,|
जो मौत को हरा दे उसे क्या कहते होंगे?????.........
एक नहीं दो मर्तबा...............!!!!!!

नीरज कुमार गुप्ता
२१-११-२००९

सूरज और चाँद

मैंने अपने बालकनी से सूरज और चाँद को उगता देखा है,|
कौन कहता है कि,
सूरज अपनी रोशनी से चाँद को छुपा लेता है,|
बल्कि चाँद के आगे सूरज फीका हो जाता है,
चाँद कि रोशनी से शुबह,चांदनी सा लगने लगता है,|
ये उसका मासूम सा चेहरा ,
हल्की-हल्की चाल ,
बड़ी-बड़ी आँखे, आँखों में नशा,
चमकता चेहरा ,होठो पर मुस्कान,
ये सब सूरज को भी फीका कर रहा था,|
मैं भी खड़ा,यिस सुबह कि चांदनी रात में,
चाँद को निहार रहा था,
उसकी आँखे इसारा कर रही थी, पास बुला रही थी,
मरी आँखे भी बर्फ सी हो गया थी,
उस शुबह कि चांदनी रात में ,
फिर धीरे-धीरे चाँद ,
सूरज कि तेज रोशनी में,शुन्य हो गया,|
मै भी खड़े-खड़े यही सोचता रहा,
काश हर दिन मेरा शुबह चांदनी रात होता,.....!!!

नीरज कुमार गुप्ता
२१-११-२००९

Friday, November 20, 2009

सोचा न था

मैंने कभी सोचा न था कि मै कविता लिखूंगा,

पर क्या बताऊ उस मित्र को जिसने,

मुझे कविता लिखने के लिए प्रेरित किया...!!!

मैंने भी उसे गुरु का दर्जा दे दिया है,|...

अब तो हर कविता लिखने के पहले उसे याद करता हु|

फिर अपने कविता को एक नया आयाम देता हु |......

नीरज कुमार गुप्ता
२०-११-२००९

यादों

यादों को याद करके अपने आसू पी जाता हूँ ...!!

यादों को याद रखने के लिए,

अपनी कविताये लिखता हूँ ..!!

नीरज कुमार गुप्ता
२०/११/०९

फुर्शत

कभी फुर्शत मिले तो मुझसे से मिलने चले आना,.....!!!!

फिर भी फुर्शत न मिले तो मेरे अर्थी को कन्धा देने जरुर चले आना,.....!!!!!!!

नीरज कुमार गुप्ता
२०/११/०९

परछाई

------------------------------------------------------- ------------------------------------------------------- ढलती शाम में, आज बिजली ...