गाँव
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एक गाँव मेरा,जो गंगा किनारे बसा !!
पीपल के छावँ में मेरा घर वहा !
आँगन में खड़ा नीम मुझे देख रहा !
कहता देखो गाँव तुम्हरा बदल गया !
ना गाँव में वो मिट्टी की सोंधी खुशबू थी
ना वो खेत की हरियाली !
ना घरो से निकलता धुँआ था
ना वो रोटी की मीठी सी खुशबू !
ना दाल में वो स्वाद था
ना चूल्हे वाली भात !
कभी गुलज़ार हुआ करता था
सुबह,शाम !
आज सब कुछ खामोश सा लगता है !
देखो कितना बदल गया है मेरा गाँव !
लालटेन के रौशनी में,
बच्चो का पढना !
चारपाई पर बैठकर;
रेडियो से प्रादेशिक समाचार सुनना !!
भोर में बर्तनों के टकराने की,
कुओ में चाप छप-छप की आवाज !!
मंदिर में घंटो की आवाज,
लोगो और पशुओ के,
खेत-खलियान में जाने की आवाज !!
आज सब कुछ खामोश सा लगता है!
देखो कितना बदल गया है मेरा गाँव !
एक गाँव मेरा, जो गंगा के किनारे बसा !!
नीरज कुमार गुप्ता
१५-०९-१२
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एक गाँव मेरा,जो गंगा किनारे बसा !!
पीपल के छावँ में मेरा घर वहा !
आँगन में खड़ा नीम मुझे देख रहा !
कहता देखो गाँव तुम्हरा बदल गया !
ना गाँव में वो मिट्टी की सोंधी खुशबू थी
ना वो खेत की हरियाली !
ना घरो से निकलता धुँआ था
ना वो रोटी की मीठी सी खुशबू !
ना दाल में वो स्वाद था
ना चूल्हे वाली भात !
कभी गुलज़ार हुआ करता था
सुबह,शाम !
आज सब कुछ खामोश सा लगता है !
देखो कितना बदल गया है मेरा गाँव !
लालटेन के रौशनी में,
बच्चो का पढना !
चारपाई पर बैठकर;
रेडियो से प्रादेशिक समाचार सुनना !!
भोर में बर्तनों के टकराने की,
कुओ में चाप छप-छप की आवाज !!
मंदिर में घंटो की आवाज,
लोगो और पशुओ के,
खेत-खलियान में जाने की आवाज !!
आज सब कुछ खामोश सा लगता है!
देखो कितना बदल गया है मेरा गाँव !
एक गाँव मेरा, जो गंगा के किनारे बसा !!
नीरज कुमार गुप्ता
१५-०९-१२