Monday, September 24, 2012

गाँव

गाँव
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एक गाँव मेरा,जो गंगा किनारे बसा !!
पीपल के छावँ में मेरा घर वहा !

आँगन में खड़ा नीम मुझे देख रहा !
कहता देखो गाँव तुम्हरा बदल गया !

ना गाँव में वो मिट्टी की सोंधी खुशबू थी
ना वो खेत की हरियाली !

ना घरो से निकलता धुँआ था
ना वो रोटी की मीठी सी खुशबू !

ना दाल में वो स्वाद था
ना चूल्हे वाली भात !

कभी गुलज़ार हुआ करता था
सुबह,शाम !
आज सब कुछ खामोश सा लगता है !
 देखो कितना बदल गया है मेरा गाँव !

लालटेन के रौशनी में,
बच्चो का पढना !
चारपाई पर बैठकर;
रेडियो से प्रादेशिक समाचार सुनना !!

भोर में बर्तनों के टकराने की,
कुओ में चाप छप-छप की आवाज !!
मंदिर में घंटो की आवाज,
लोगो और पशुओ के,
खेत-खलियान में जाने की आवाज !!

आज सब कुछ खामोश सा लगता है!
देखो कितना बदल गया है मेरा गाँव !
एक गाँव मेरा, जो गंगा के किनारे बसा !!


                                नीरज कुमार गुप्ता
                                     १५-०९-१२

Wednesday, September 12, 2012

आज़ाद


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सरसराती हवाओं के झोकों ने !
सिरहाने रखे मेरे डायरी के पन्नो
को ऐसे उल्टा !
शायद !
फडफडाती पन्नो के ऊपर
उकरे हुए शब्द!
आज़ाद होना चाहते है !

नीरज कुमार गुप्ता
११-०९-१२

परछाई

------------------------------------------------------- ------------------------------------------------------- ढलती शाम में, आज बिजली ...