Monday, September 26, 2011

मै फिर से उड़ना चाहता हू..

मै फिर से उड़ना चाहता हू..!!

पतंग के डोर से आगे...!
तितिलियो के पंख से आगे...!
फूलो के खुशबुओ से आगे...!
भवरो के आवाज से आगे...!

बिजली के चमक से आगे...!
तुफानो के थपेड़ो से आगे...!
बदलो के रफ़्तार से आगे...!
समुन्द्र के लहरों से आगे...!
सूर्य के किरणों से आगे...!

एक सोच से आगे...!
एक बार मै फिर से उड़ना चाहता हू....!!

नीरज कुमार गुप्ता
२५-०९-११

Saturday, September 17, 2011

सपने

रात भर कितने सपने बनते, बिगड़ते गये...!!!
कुछ याद थे, कुछ नहीं...!!!
पर जो याद थे,...!!
आधे अधूरे सही....!!
पर वो साथ थे....

नीरज कुमार गुप्ता
१७-०९-११

Friday, September 9, 2011

'कुटिया'

बड़ा नहीं,छोटा ही सही..!
सबसे अलग,सबसे थलग..!
किनारे पड़ा,एक छोटी 'कुटिया' मेरी....
दिन में ही रात सही...!!
रात का पता नहीं...!
बारिश में भीगे नहीं,हवा में गिरे नहीं..!

बिस्तर में मकड़ी रेंग रहे....!!
चूहे सब उस पर खेल रहे..!
एक पंखा लटक रहा...
झालो के साथ खेल रहा..!!
सबसे अलग सबसे थलग...
एक छोटी सी 'कुटिया' मेरी....

नीरज कुमार गुप्ता
०८/०९/११

परछाई

------------------------------------------------------- ------------------------------------------------------- ढलती शाम में, आज बिजली ...