Friday, September 9, 2011

'कुटिया'

बड़ा नहीं,छोटा ही सही..!
सबसे अलग,सबसे थलग..!
किनारे पड़ा,एक छोटी 'कुटिया' मेरी....
दिन में ही रात सही...!!
रात का पता नहीं...!
बारिश में भीगे नहीं,हवा में गिरे नहीं..!

बिस्तर में मकड़ी रेंग रहे....!!
चूहे सब उस पर खेल रहे..!
एक पंखा लटक रहा...
झालो के साथ खेल रहा..!!
सबसे अलग सबसे थलग...
एक छोटी सी 'कुटिया' मेरी....

नीरज कुमार गुप्ता
०८/०९/११

No comments:

परछाई

------------------------------------------------------- ------------------------------------------------------- ढलती शाम में, आज बिजली ...