एक कविता थी !
न जाने कब से जगी थी !
जब रात सोने गया
पास ही,
टेबल पर टुकड़ो में पड़ी थी !
उस कविता को न जाने
कहा-कहा न ढूंढा !
पर पास ही बिखरी पड़ी थी,
एक कविता थी !
न जाने कब से जगी थी !
कुछ देर सोचता रहा
यह यहाँ कैसे आई
जो भी हो,
साबुत नहीं,टुकड़ो में तो आई !
आज खुश हु टुकड़ो में.
पाकर !
लौट तो आई किस्मत से जीतकर !
एक कविता थी
न जाने कब से जगी थी !
नीरज कुमार गुप्ता
२७-०१-१३