Monday, January 28, 2013

टुकड़ा


    एक कविता थी !
न जाने कब से जगी थी !

जब रात सोने गया
पास ही,
टेबल पर टुकड़ो में पड़ी थी !

उस कविता को न जाने
कहा-कहा न ढूंढा !
पर पास ही बिखरी पड़ी थी,

   एक कविता थी !
न जाने कब से जगी थी !

कुछ देर सोचता रहा
यह यहाँ कैसे आई
 जो भी हो,
साबुत नहीं,टुकड़ो में तो आई !

आज खुश हु टुकड़ो में.
पाकर !
लौट तो आई किस्मत से जीतकर !

   एक कविता थी
न जाने कब से जगी थी !

                         नीरज कुमार गुप्ता
                                 २७-०१-१३

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