Wednesday, November 13, 2013

भोर

भोर
...................…………………………………………।
...................…………………………………………।

भोर हुआ था,
बस मैं बैठा कुछ
खिड़की से देखने की कोशिश कर
रहा था !!

पर फॉग ने, कुछ दुरी  को अपने
आगोश में ले रखा था !!

बस के हॉर्न से,
फॉग की बुँदे विबरेट कर रहे थे,
आने वाले को आगाह कर रहे थे !!

बस का स्पीड तेज हो रहा था,
गुलाबी ठण्ड,
से पोर -पोर सिहर रहा था !!

फ़ॉग की कुछ बुँदे,
आकर पलकों से टकरा रहे थे !!
बिछड़ने के अफ्रेड से,
आंशु बहा रहे थे !!

कुछ समय पश्चात,
स्काई में लाली उठाने लगा था !!
फ़ॉग को आग अपने आगोश,
में ले रहा था !!

मैं भी अपने डेस्टिनेशन तक,
आगे बढ़ रहा था !!

नीरज कुमार गुप्ता
4-10-2013 

Sunday, August 4, 2013

जाते -जाते

जाते -जाते

मै ठहरा था उनके लिए !
लेकिन जाते-जाते आंशु दे गए !!

सोचा था प्यार की दो बाते करेंगे !
पर जाते जाते बेवफाई कर गए !!

जो सपने देखे थे हमने !
लेकिन जाते जाते सपनो के भवर में
छोड़ गए !!

चले तो साथ हम !
पर जाते जाते भूल्भूल्या में
छोड़ गए !!

खड़े रहे चुपचाप !
पर जाते जाते पुरानी
यादो को छोड़ गए !!

नीरज कुमार गुप्ता
२७-०६-२०१३

Tuesday, April 30, 2013

अस्सी


अस्सी पर अस्सी खोजता हु !!

साधुओ के जटाओ में,
 कमंडल लिए हुए हांथो में
निर्मल गंगा खोजता हु !!

डूबते सूरज के रोशनी में,
टकराती धाराओं के घाटो से,
ऊपर उठती कुछ बूंदों में,
वो चमक खोजता हु !!
एक निर्मल गंगा खोजता हु !

शाम के समय,
गंगा श्रृंगार में,
घंटो के पुकार में,
जनमानस को खोजता हु !

फूलो से पटी,
नाओं के अम्बार में,
निर्मल गंगा खोजता हु !

अस्सी पर अस्सी खोजता हु !!

                     नीरज कुमार गुप्ता
                   वाराणसी (अस्सी घाट)
                          २८-०४-२०१३

Tuesday, April 9, 2013

आशु


कायर तो वे है जो,
जो हमेशा गालो  पर आशुओ को
गिराया करते है !!

ज़रा साहसो से  पूछो जो,
मुस्कारते हुए भी आशुओ को
सोख जाया करते है !

                नीरज कुमार गुप्ता
                       ८-४-१३

उदास



कितना उदास मौसम है !!
हवा के झोकों से,
शीतल !

पेड़ों से,
पत्ते !

खेतो से,
हरियाली !

फूलो से,
महक !

नदियों से,
पानी !

मन से,
उमंग !

कितना उदास मौसम है !

                                     नीरज कुमार गुप्ता
                                             ८-०४ २०१३

Monday, January 28, 2013

टुकड़ा


    एक कविता थी !
न जाने कब से जगी थी !

जब रात सोने गया
पास ही,
टेबल पर टुकड़ो में पड़ी थी !

उस कविता को न जाने
कहा-कहा न ढूंढा !
पर पास ही बिखरी पड़ी थी,

   एक कविता थी !
न जाने कब से जगी थी !

कुछ देर सोचता रहा
यह यहाँ कैसे आई
 जो भी हो,
साबुत नहीं,टुकड़ो में तो आई !

आज खुश हु टुकड़ो में.
पाकर !
लौट तो आई किस्मत से जीतकर !

   एक कविता थी
न जाने कब से जगी थी !

                         नीरज कुमार गुप्ता
                                 २७-०१-१३

परछाई

------------------------------------------------------- ------------------------------------------------------- ढलती शाम में, आज बिजली ...