Sunday, June 14, 2015

भुलक्कड़
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जिंदगी के आपा धापी में.
कुछ भुलक्कड़ सा हो गया हुँ !

हाँथ में चाभी लिए चाभी ढूंढता हुँ !
वॉलेट को बैग में रख कर ,
पेन को पॉकेट में रख कर,
न जाने क्या क्या ,कहा कहा
ढूंढता हुँ !

कुछ भुलक्कड़ सा हो गया हुँ !

न जाने ये कैसी भुलक्कड़ सी,
जिंदगी हो गयी है !

जो किताब में मन और,
मन में किताब रख कर
सोना भूल जाता हुँ  !

 कुछ भुलक्कड़ सा हो गया हुँ !

                                            नीरज कुमार गुप्ता
                                                १४-०६-२०१४ 

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