Thursday, June 18, 2015

              *  मुश्किलें  *

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जब छोटा था,मुश्किलें भी बहुत थी
बस अर्थ न मालूम थे,मुश्किलें के !

उम्र के साथ मुश्किलें भी बढ़ती गयी,
कुछ साथ आती गयी,कुछ साथ छोड़ती गयी !

था जवानी का दौर,जकड़ा था मुश्किलो का दौर !
निपट लिया था,मैंने मुश्किलो को आसानी से,
बस निकल गया था ये दौर !

कुछ ने पाठ पढ़ाया,कुछ ने जीवन का दर्शन कराया !
साथ मेरा मुश्किलो का,
ठहर जाये तो अच्छा,न ठहरे तो और अच्छा !

मुसकुरा दिया मैंने,
मुश्किलो को देखकर,आधे लौट गए
कुछ बौनों की तरह !!

बस आदत सी हो गयी है,
तुझे देखकर मुस्कराने की !!

                                          नीरज कुमार गुप्ता
                                             १८-०६-२०१५ 

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