Sunday, June 14, 2015

पहचान

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दस बाई दस का कमरा ,
धुलो से भरा,जालो से पटा !

कोने में पड़ी मेज ,साथ में रखी चेयर ,
आलमारी पर रखे बुक्स,
धूल के फांक खा रहे होंगे।

कही चाय के प्याले लुढ़के होंगे।
नंगी खिड़की से आती रोशनी,
धूल के कणों पर चमकते होंगे !

दीवारो पे कुरेदे,कुछ फॉर्मूले,
धूल के कणो में से झांकते होंगे !
कही किसी जगह अपना,
पहचान छोड़ आया हुँ !

पहचान लेंगे वो,
जिसका नया ठिकना होगा !

 किसी कोने में अपना,
नाम लिख छोड़ आया हुँ !


                             नीरज कुमार गुप्ता
                                  ११-०६-२०१५ 

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