................................................
................................................
दस बाई दस का कमरा ,
धुलो से भरा,जालो से पटा !
कोने में पड़ी मेज ,साथ में रखी चेयर ,
आलमारी पर रखे बुक्स,
धूल के फांक खा रहे होंगे।
कही चाय के प्याले लुढ़के होंगे।
नंगी खिड़की से आती रोशनी,
धूल के कणों पर चमकते होंगे !
दीवारो पे कुरेदे,कुछ फॉर्मूले,
धूल के कणो में से झांकते होंगे !
कही किसी जगह अपना,
पहचान छोड़ आया हुँ !
पहचान लेंगे वो,
जिसका नया ठिकना होगा !
किसी कोने में अपना,
नाम लिख छोड़ आया हुँ !
नीरज कुमार गुप्ता
११-०६-२०१५
................................................
दस बाई दस का कमरा ,
धुलो से भरा,जालो से पटा !
कोने में पड़ी मेज ,साथ में रखी चेयर ,
आलमारी पर रखे बुक्स,
धूल के फांक खा रहे होंगे।
कही चाय के प्याले लुढ़के होंगे।
नंगी खिड़की से आती रोशनी,
धूल के कणों पर चमकते होंगे !
दीवारो पे कुरेदे,कुछ फॉर्मूले,
धूल के कणो में से झांकते होंगे !
कही किसी जगह अपना,
पहचान छोड़ आया हुँ !
पहचान लेंगे वो,
जिसका नया ठिकना होगा !
किसी कोने में अपना,
नाम लिख छोड़ आया हुँ !
नीरज कुमार गुप्ता
११-०६-२०१५
No comments:
Post a Comment