जब फागुन आया तो,फूलो ने साथ छोड़ा|
जब चैत आया तो,पतों ने पेड़ो का साथ छोड़ा|
सावन आया तो ,घटाओ ने साथ छोड़ा |
जब ज्वार आया तो,लहरों ने सागर का साथ छोड़ा |
जब कोहरा हुआ तो, पवन ने साथ छोड़ा |
जब दुःख आया तो, आशुओ ने आँखों का साथ छोड़ा |
जब गरीबी आई तो,पैसो ने साथ छोड़ा|
जब तूफान आया तो, कसती ने किनारा छोड़ा|
जब मेरे ऊपर दुखों का पहाड़ आया तो ,अपनों ने साथ छोड़ा|
बस 'तुम्ही' हो जिसने मेरा कभी न साथ छोड़ा|
नीरज कुमार गुप्ता
३०/०३/१०
जब चैत आया तो,पतों ने पेड़ो का साथ छोड़ा|
सावन आया तो ,घटाओ ने साथ छोड़ा |
जब ज्वार आया तो,लहरों ने सागर का साथ छोड़ा |
जब कोहरा हुआ तो, पवन ने साथ छोड़ा |
जब दुःख आया तो, आशुओ ने आँखों का साथ छोड़ा |
जब गरीबी आई तो,पैसो ने साथ छोड़ा|
जब तूफान आया तो, कसती ने किनारा छोड़ा|
जब मेरे ऊपर दुखों का पहाड़ आया तो ,अपनों ने साथ छोड़ा|
बस 'तुम्ही' हो जिसने मेरा कभी न साथ छोड़ा|
No comments:
Post a Comment